हथियार छोड़कर सिलाई, वेल्डिंग और इलेक्ट्रिकल जैसे कौशल सीख रहे समर्पित नक्सली, स्वरोजगार की दिशा में मजबूत होती नई राह

बस्तर में बदलती तस्वीर की कहानी – कोरबा के महिला पत्रकारों की जुबानी
– आत्मसमर्पित नक्सली बन रहे आत्मनिर्भर, लाइवलीहुड कॉलेज में 500 से अधिक सीख रहे हुनर
बस्तर से लौट कर बीता चक्रवर्ती की रिपोर्ट
अंतिम किस्त
कोरबा। छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा स्थित लाइवलीहुड महाविद्यालय नक्सल प्रभावित क्षेत्र में बदलाव की एक मजबूत और जमीनी मिसाल बनकर उभरा है। यहां संचालित विशेष कौशल विकास योजना के तहत 500 से अधिक आत्मसमर्पित नक्सली विभिन्न व्यावसायिक प्रशिक्षणों से गुजर रहे हैं और धीरे-धीरे आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं।
बस्तर के ग्राउंड रियलिटी को समझने के लिए कोरबा से पहुंची महिला पत्रकारों की टीम तीसरे दिन दंतेवाड़ा के लाइवलीहुड कॉलेज पहुंची। इस दौरान टीम ने प्रशिक्षण ले रहे युवाओं से बातचीत की और उनके बदलते जीवन को करीब से महसूस किया। वरिष्ठ पत्रकार रेनू जायसवाल ने बताया कि इस पूरी पहल का उद्देश्य स्पष्ट है कि हिंसा का रास्ता छोड़ चुके युवाओं को कौशल देकर समाज की मुख्यधारा से जोड़ा जाए। उन्होंने कहा कि यहां प्रशिक्षण का माहौल यह साबित करता है कि सही दिशा मिले तो सबसे कठिन पृष्ठभूमि से आए लोग भी अपने जीवन को बदल सकते हैं। यहां सिलाई, वेल्डिंग, इलेक्ट्रिकल और अन्य तकनीकी ट्रेडों में प्रशिक्षण दिया जा रहा है। सरकार की योजनाओं के तहत स्वरोजगार शुरू करने के लिए ऋण सुविधा भी उपलब्ध कराई जा रही है। साथ ही कई प्रशिक्षित युवाओं को अलग-अलग क्षेत्रों में रोजगार से भी जोड़ा गया है।
पत्रकार मुस्कान भंडारी ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि केंद्र में बड़ी संख्या में महिलाएं और युवतियां प्रशिक्षण ले रही हैं, जो कभी नक्सली संगठन का हिस्सा थीं। बातचीत के दौरान कई युवाओं ने स्वीकार किया कि उन्हें बहला-फुसलाकर संगठन में शामिल किया गया था। इनमें ऐसे भी लोग शामिल हैं जिन पर कभी पाँच लाख रुपये तक का इनाम घोषित था। आज वही युवा बंदूक छोड़कर हुनर के सहारे अपने भविष्य को गढ़ रहे हैं। पत्रकार प्रतिमा सरकार ने कहा कि प्रशिक्षण केंद्र का माहौल पूरी तरह बदलते बस्तर की कहानी कहता है। युवाओं में अपने परिवार के लिए कुछ बेहतर करने की चाह, आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा और दोबारा हिंसा की राह से दूर रहने का संकल्प साफ दिखाई देता है।
पत्रकार आशा ठाकुर और रजनी चौहान ने संयुक्त रूप से कहा कि यहां सबसे बड़ा बदलाव मानसिकता में दिख रहा है। जहां पहले डर और भटकाव था, वहां अब सीखने की ललक और जिम्मेदारी का भाव दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि यह पहल केवल प्रशिक्षण नहीं, बल्कि एक नई जिंदगी की शुरुआत है।
जमीनी स्तर पर किए गए प्रयासों की भूमिका रही महत्वपूर्ण – एसडीओपी
दंतेवाड़ा के अनुविभागीय पुलिस अधिकारी राहुल कुमार उईके ने बताया कि इस बदलाव के पीछे लगातार संवाद, विश्वास निर्माण और जमीनी स्तर पर किए गए प्रयासों की अहम भूमिका रही है। वर्ष 2022 से लगातार दूरस्थ इलाकों में जाकर लोगों से संपर्क स्थापित किया गया और उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने का काम किया गया। उन्होंने कहा कि कठिन परिस्थितियों के बावजूद अब इसके सकारात्मक परिणाम सामने आ रहे हैं और बड़ी संख्या में लोग हिंसा का रास्ता छोड़कर समाज से जुड़ रहे हैं।