सर्पलोक – यहाँ दहेज में बेटी को देते है 7 सांप…. ताकि ससुराल में आये सम्पन्नता…. बच्चो के लिए करैत और ब्लैक कोबरा खिलौने जैसे… सांप से खेलते बच्चो का देखे वीडियो

Laxman /

कोरबा । घर में सांप घुसा तो लोग बाहर भागने में ही भलाई समझते हैं। इस बारिश इतने सांप दिखे कि कोरबा को दूसरा सर्पलोक कहा जाने लगा है। शहर से लेकर ग्रामीण अंचलों में अजगर, अहिराज, धामन, कोबरा व करैत जैसे काफी विषैले सर्प शामिल हैं। कई घटनाओं में लोगों की जान भी गई। पर एक गांव ऐसा भी है, जहां के नन्हें-मुन्ने बच्चों के लिए कोबरा, करैत व अहिराज जैसे विषैले सर्पों से खेलना बच्चों का खेल है। दरअसल इस समुदाय की संस्कृति, परंपरा व आजीविका में सर्प का बड़ा महत्व है, जिसे आत्मसात करने बाल आयु में ही उनके हाथ में सांप दे दिए जाते हैं, ताकि वे एक-दूसरे के जीवन में पूरी तरह शामिल हो जाएं।

बचपन में ही सांपों से दोस्ती की यह परंपरा जिला मुख्यालय से 40 किलोमीटर दूर ग्राम सुहागपुर के संवरा मोहल्ला में पुश्तों से चली आ रही। इस समुदाय के बच्चों के लिए इन विषैले सर्पों के साथ खेलना ही पूरे दिन का सबसे आसान काम है। पिछले 40 साल से यहां निवास करने वाले संवरा समुदाय के लोगों के लिए सर्प न केवल रोजगार का साधन है, पुश्तों से चली आ रही परंपरा व संस्कृति में शामिल हैं। जहरीले कोबरा की फुफकार सुनकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं, पर यहां के इन मासूम बच्चों के लिए यह सर्प किसी खिलौने की तरह है, जिसे अपने हाथों में लपेटना, गले में पहनना और किसी लॉलीपॉप की तरह लेकर यहां-वहां घूमते रहना आनंददायी है। बमुश्किल तीन से पांच साल के बच्चे भी इन सांपों को ऐसे पकड़ लेते हैं जैसे सांप और इनके बीच पुरानी दोस्ती हो।

दहेज में सात विषैले सर्प, ताकि सुखी रहे बेटी

विवाह में लड़की पक्ष की ओर से उपहार स्वरूप वह तमाम चीजें देने का रिवाज तो आपने सुना होगा, जिससे बेटी का घर सुखी और समृद्ध हो जाए। पर संवरा समुदाय का यह रिवाज जानकर आप भी अचंभित हुए बिना खुद को रोक नहीं सकेंगे। इस समुदाय में संवरा जाति में बेटी के ब्याह के वक्त दहेज में बर्तन-कपड़ों के साथ सात जहरीले सर्प देकर विदा करने का रिवाज है, ताकि ससुराल की आमदनी में वृद्धि-समृद्धि हो। जहरीले सांप भेंट करने की बात आपने शायद ही कभी कहीं और सुनी हो, पर संवरा समुदाय की संस्कृति में शामिल यह रिवाज अपने आप में किसी अचरज से कम नहीं।

पुश्तैनी परंपरा का हर हाल में पालन

संवरा समुदाय के लोग गांव के एक मोहल्ले में छोटी-छोटी झोपड़ी बनाकर रहते हैं। इनकी जीवनशैली पर गौर करें तो रोजगार कहें या आजीविका, यह समुदाय सिर्फ सांपों पर आश्रित हैं। जगह-जगह घूमकर, सड़क-चौराहे पर सांप दिखा कर इनाम में कुछ पैसों की गुजारिश ही इनका पेशा है। इसी तरह होने वाली कमाई से ही इनका व इनके बच्चों का भरण-पोषण निर्भर है। यहां तक कि कोई दूसरा काम, रोजी-मजदूरी मिलने के बाद भी सांप लेकर घूमने की पुश्तैनी परंपरा का पालन हर किसी के लिए अनिवार्य है।

वर्षों से सांप पकड़ने का कार्य कर रहे इन लोगों का कहना है कि इस परंपरा को आगे भी कायम रखा जाएगा। यही वजह है सभी अपने बच्चों को भी सांप पकड़ने की कला सिखाते हैं। उन्हें भी सांप पकड़ने में मजा आता है। संवरा समुदाय की दशा को देखकर समझा जा सकता है कि आज भी वे शिक्षा व जागरूकता की कमी के चलते विकास की मुख्य धारा से दूर हैं। इस गांव में करीब 20 परिवार निवासरत हैं, मगर शासकीय सुविधाएं आज तक नहीं मिल सकी हैं। न उनके पास रोजगार है और न ही रहने का कोई निश्चित ठिकाना, इसलिए सांपों का खेल-तमाशा ही इनके लिए जीवन की सबसे बड़ी जुगत है, जिसे वे छोड़ने को तैयार नहीं।